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5 साल तक जनता से दूरी, चुनाव आते ही हाथ जोड़कर खड़े नेता! आखिर क्यों बदल जाता है मिजाज?

संपादकीय। चुनाव आते ही नेताओं का मौसम बदल जाता है। पांच साल तक जनता के फोन का जवाब नहीं देने वाले नेता अचानक हाथ जोड़कर खड़े दिखाई देने लगते हैं। जिन गलियों में वर्षों तक उनकी गाड़ी नहीं पहुंची, उन्हीं गलियों में चुनावी मौसम में उनका काफिला बार-बार नजर आता है। कभी चाय की थड़ी पर बैठकर जनता का हाल पूछा जाता है, कभी किसी बुजुर्ग के पैर छुए जाते हैं और कभी किसी गरीब के घर बैठकर रोटी खाने की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती है। सवाल सिर्फ इतना है—यह बदलाव जनता के लिए है या वोट के लिए?

पांच साल तक जनता कहां थी?

लोकतंत्र का सबसे बड़ा मजाक शायद यही है कि जनता की याद नेताओं को अक्सर चुनाव के आसपास ही ज्यादा आती है। चुनाव जीतने के बाद वही नेता सुरक्षा घेरे, सरकारी बैठकों और प्रोटोकॉल के बीच दिखाई देते हैं। आम आदमी अपनी समस्या लेकर दफ्तरों के चक्कर लगाता रहता है और नेता तक पहुंचना कई बार किसी परीक्षा को पास करने जैसा हो जाता है।

लेकिन जैसे ही चुनाव की तारीख नजदीक आती है, तस्वीर बदल जाती है। नेता खुद जनता के दरवाजे तक पहुंचने लगते हैं। फोन करने की जरूरत नहीं रहती, अपॉइंटमेंट लेने की जरूरत नहीं रहती। अब नेता कहते हैं—“हम तो आपके अपने हैं।”

यही वह क्षण है जब मतदाता के मन में एक सवाल जरूर उठना चाहिए—अगर आप इतने अपने थे तो पिछले पांच साल कहां थे?

चाय की थड़ी पर बैठने का अचानक प्रेम क्यों?

चुनाव आते ही चाय की थड़ी अचानक राजनीतिक प्रयोगशाला बन जाती है। नेता वहां बैठकर चाय पीते हैं, दुकानदार से बातचीत करते हैं और कैमरे के सामने आम आदमी की तरह दिखाई देने की कोशिश करते हैं। किसी गरीब के घर खाना खाना भी चुनावी अभियान की तस्वीर बन जाता है।

यह जनसंपर्क लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन सवाल तब उठता है जब यह सब केवल चुनावी मौसम तक सीमित रह जाए। जनता को चाय चुनाव के समय ही क्यों याद आती है और महंगाई का दर्द पांच साल तक क्यों नहीं?

बुजुर्गों के पैर छूने की होड़

चुनाव के दौरान बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने की तस्वीरें खूब दिखाई देती हैं। नेता झुकते हैं, हाथ जोड़ते हैं और कहते हैं कि आपका आशीर्वाद चाहिए। यह दृश्य भावनात्मक जरूर है, लेकिन लोकतंत्र में आशीर्वाद के साथ हिसाब भी जरूरी है।

जिस बुजुर्ग ने पांच साल तक पेंशन, सड़क, पानी या अस्पताल की समस्या झेली हो, उससे सिर्फ चुनाव के समय आशीर्वाद मांगना कितना पर्याप्त है? आशीर्वाद मांगने से पहले जवाबदेही का हिसाब देना भी तो जरूरी है।

वादों की बरसात और जनता की उम्मीद

चुनाव करीब आते ही घोषणाओं का मौसम भी शुरू हो जाता है। सड़क बनेगी, पानी आएगा, रोजगार मिलेगा, अस्पताल सुधरेगा, नई योजनाएं आएंगी—वादों की सूची इतनी लंबी हो जाती है कि मतदाता को लगता है कि अगले पांच साल में पूरा इलाका बदल जाएगा।

लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद वही वादे फाइलों में चले जाते हैं। फिर जनता पूछती है तो जवाब मिलता है—प्रक्रिया चल रही है, बजट नहीं आया, मंजूरी बाकी है या मामला सरकार के स्तर पर है।

कटाक्ष यही है कि चुनाव से पहले हर काम “बस होने ही वाला” होता है और चुनाव के बाद हर काम “प्रक्रिया में” चला जाता है।

जब रिपोर्ट कार्ड मांगो तो मुद्दा बदल जाता है?

जनता अगर पूछे कि पिछले पांच साल में रोजगार के कितने अवसर पैदा हुए? सड़कें कितनी बनीं? अस्पताल की व्यवस्था कितनी सुधरी? पानी की समस्या कितनी दूर हुई? भ्रष्टाचार पर क्या कार्रवाई हुई? तो राजनीति का असली इम्तिहान शुरू होता है।

कई बार इन सवालों का सीधा जवाब देने के बजाय चर्चा का रुख भावनात्मक मुद्दों की ओर मोड़ दिया जाता है। जाति, धर्म, क्षेत्र, सम्मान और अस्मिता जैसे मुद्दे अचानक चर्चा के केंद्र में आ जाते हैं। इससे सबसे जरूरी सवाल पीछे छूट जाता है—“आपने पांच साल में किया क्या?”

नेता बदलते हैं या मतदाता को बदलना होगा?

सवाल सिर्फ नेताओं से नहीं है। सवाल हम मतदाताओं से भी है। अगर हम हर चुनाव में पुराने वादे भूलकर नए वादों पर भरोसा करते रहेंगे, तो राजनीति भी उसी तरह चलती रहेगी।

नेता वही करेंगे जिससे वोट मिलेगा। अगर वोट जाति, धर्म, भावनाओं और कुछ दिनों की चमक पर मिलेगा तो राजनीति भी उसी दिशा में जाएगी। लेकिन अगर मतदाता सड़क, अस्पताल, स्कूल, रोजगार, कानून-व्यवस्था और स्थानीय विकास के आधार पर वोट देगा, तो नेताओं को भी अपना एजेंडा बदलना पड़ेगा।

हाथ जोड़ने वाले नेता से एक सवाल जरूर पूछिए

जब चुनाव के समय कोई नेता आपके दरवाजे पर आए और हाथ जोड़कर वोट मांगे, तो उसका सम्मान जरूर कीजिए। लेकिन एक सवाल जरूर पूछिए—“पिछली बार आपने जो वादा किया था, उसका क्या हुआ?”

पूछिए कि पांच साल में कितने दिन जनता के बीच रहे? कितनी समस्याएं हल कराईं? कितनी बार आम आदमी की आवाज सदन या सरकार तक पहुंचाई? और जो काम नहीं हुए, उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

क्योंकि वोट सिर्फ बटन नहीं, पांच साल का फैसला है

चुनाव का दिन केवल एक दिन होता है, लेकिन उसका असर अगले पांच साल तक रहता है। इसलिए चुनावी मौसम की चमक-दमक, बड़े-बड़े भाषण और हाथ जोड़ती तस्वीरों से आगे जाकर नेता का पूरा रिकॉर्ड देखना जरूरी है।

नेता का हाथ जोड़ना कुछ मिनट का हो सकता है, लेकिन आपका वोट पांच साल का फैसला करता है।

इसलिए अगली बार जब कोई नेता आपकी गली में अचानक दिखाई दे तो सिर्फ यह मत पूछिए कि “आप आए कैसे?” बल्कि यह भी पूछिए—“पिछले पांच साल गए कहां थे?”

यही सवाल लोकतंत्र को मजबूत करेगा। यही सवाल चुनावी राजनीति को जवाबदेह बनाएगा। और शायद यही वह दिन होगा जब नेता चुनाव आने का इंतजार नहीं करेंगे, बल्कि पूरे पांच साल जनता के बीच रहना अपनी जिम्मेदारी समझेंगे।

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